समाज सेवा नही व्यवसाय बनी पत्रकारिता तेजी से विकृत हो रहा पत्रकारिता का स्वरूप
हरदा। जिले में पत्रकारिता का स्वरूप तेजी से विकृत होता जा रहा है। इसको समाज सेवा की नजर से नही बल्कि व्यवसाय के दृष्टिकोण से देखा जा रहा है। एक पत्रकार एक से अधिक अखबार की एजेंसी लेकर विज्ञापन हासिल कर अपनी कमाई कर रहे है जबकि उनके अखबार की प्रसार संख्या पर नजर दौडायी जाये तो चौकाने वाली स्थिति सामने आ जायेगी। नाममात्र की प्रसार संख्या वाले अखबार को किस आधार पर विज्ञापन मिल जाता है यह जांच का विषय बन गया है। जिम्मेदार अधिकारी जिस विज्ञापन का प्रचार प्रसार अधिक नही करना चाहते है उस विज्ञापन को ऐसे अखबार में दे देते है जो पाठको की पहुंच से कोसो दूर है। जिले के सभी सरकारी कार्यालयों में किस-किस अखबार में अब तक विज्ञापन जारी किया गया है। इसका आंकडा इकट्ठे किया जाये तो विज्ञापन के माध्यम से अधिकाधिक कमाई करने वाले पत्रकारो का असली चेहरा उजागर हो जायेगा। जिला जनसंपर्क अधिकारी पत्रकारों के पेपर बिल को देखने की कार्यवाही करे तो जिले में उनके कितने पेपर आ रहे है इसका पता आसानी से चल सकता है। एक समय था जब मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ माना जाता था। मीडिया के स्वरूप के विकृत हो जाने से अब मीडिया के मायने बदल गये है। वास्तविकता से हटकर जानकारियां जहां एक ओर परोसी जा रही है वही दूसरी ओर लोगो की आंख धूल झोकने का भी प्रयास किया जा रहा है। इस मुद्दे पर चिंतन, बहस, और गौर करनी की जरूरत है अन्यथा निकट भविष्य में पत्रकारिता का स्तर और गिर जायेगा। नियमानुसार बीजेएमसी कोर्स करने वालों को ही पत्रकारिता करनी की पात्रता दी जानी चाहिए किन्तु पत्रकारिता के लिए योग्यता का निर्धारण प्रभावी ढंग से नही किया गया है, जिसका फायदा उठाकर पत्रकारिता का गलत इस्तेमाल किया जा रहा है। जो एक चिंतनीय एवं विचारणीय प्रश्र बन गया है। इस पर मंथन कर उचित कदम उठाने की जरूरत है। ---------------------
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