शांति का टापू हरदा माफियाओं के शिकंजे में, तू डाल-डाल मैं पात-पात की तर्ज पर सभी माफिया सक्रिय

हरदा -इन दिनों शांति का टापू कहा जाने वाला हरदा माफियाओं के शिकंजे में है ।यहां मची हलचल देश और प्रदेश की प्रमुख सुर्खियां बन गई है ।राजनीतिक घटनाक्रम भी चर्चा का विषय बना हुआ है ।जिला कलेक्टर का तबादला होना और तबादला निरस्त होना आदि जो प्रक्रिया चल रही है उस पर लगा लेवल मिटने लगा है। मां नर्मदा के पावन तट पर वर्षों से चल रही अवैध खदानों का मामला तूल पकड़ा और जिला प्रशासन ने ताबड़तोड़ कार्यवाही करते हुए आधा सैकड़ा से अधिक डंपरों को राजसात किया किंतु इतनी बड़ी कार्यवाही में एक भी बड़े ठेकेदार का नाम उभर कर सामने नहीं आया। हालांकि जिला कलेक्टर ने 13 करोड़ का जुर्माना लगा कर शासन को राजस्व के रूप में फायदा पहुंचाया है। अभी छीपानेर में चल रही अबैध खदानों का मामला ठंडा नहीं हुआ था की उसके पहले टिमरनी के बिच्छापुर में गंजाल और मोरन नदी में रेत उत्खनन परिवहन का मामला जोर पकड़ लिया ।रेत माफिया तू डाल-डाल मैं पात-पात की तर्ज पर मां नर्मदा के तट को छोड़कर दूसरा किनारा पकड़ लिया। गंजाल मोरन नदी पर अवैध तरीके से पुल बनाकर होशंगाबाद से दिन रात रेत का परिवहन हुआ और रेत का पहाड़ जैसा ढेर इकट्ठा कर दिया। सूचना मिलने पर एसडीएम तहसीलदार मौके पर पहुंचे कानूनी कार्रवाई तो चल रही रही है किंतु रेत माफियाओं के हौसले की दाद देनी पड़ेगी। इतनी बड़ी कार्रवाई के बाद भी उनके हौसले पस्त नहीं हुए और वह हार नहीं माने यहां नहीं तो वहां धंधा चालू कर दिया रेत माफियाओं के सिर पर किसका हाथ है और वह किसके दम पर ऐसा कर रहे हैं यह एक यक्ष प्रश्न है। रेत माफियाओं के साथ-साथ वन माफिया भी सक्रीय - वन परिक्षेत्र मगरधा में करोड़ों की कीमत के बेशकीमती सागौन के पेड़ कट गए फिर भी वन विभाग के आलाधिकारियों के कान में जूं तक नहीं रेंगी। सागौन की कटाई का मामला तुळ पकड़ने के बाद अब अफसर खोजबीन में लगे हैं। जबकि पूरा परिक्षेत्र उजड़ गया है घना जंगल वीरान हो गया है।सागौन के ठूठ दिख रहे हैं। सांसद ज्योति धुर्वे के आगमन पर वन माफिया के लंबे समय से सक्रीय होने का मामला जोर पकड़ा। स्थानीय लोगों ने इस संबंध में ज्ञापन देकर वन विभाग के अफसरों के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की। इतनी बड़ी संख्या में गुपचुप सागौन के सैकड़ों पेड़ कट गए और वन विभाग के अफसरों को इसकी खबर तक नहीं लगी यह बात लोगों के गले नहीं उतर रही ।सारे मामले की गहन छानबीन होती तो निसंदेह चौंकाने वाले रहस्य उजागर होंगे ।एक तरफ रेत माफिया तो दूसरी तरफ वन माफिया दोनों पर्यावरण असंतुलन की परवाह किए बिना छेड़छाड़ कर रहे हैं जबकि इसके घातक दुष्परिणाम से वह भी अपने आप को नहीं बचा सकते।

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