जिम्मेदार कौन?? आखिर कब टूटेगी अभिभाबको की चुप्पी???
नया शिक्षा सत्र शुरू होते ही प्राइवेट स्कूलों की खबरें अखबारों में प्रमुखता से देखने को मिलती है। प्राइवेट स्कूलों में खेल मैदान नहीं ,हर साल पुस्तकें ड्रेस बदली जाती है, कमीशनखोरी हो रही है। ***प्रमुख खबरें* स्कूली बसों की खुली खिड़कियों से झांकते नौनिहाल ,घरेलू गैस से चलती मारुती वैन जो तीन चार राउंड लगाने के चक्कर में अत्यधिक स्पीड से चलते हैं ।ऑटो जिसमें 8 से 10 बच्चे आसानी से बैठ जाते हैं किंतु अत्यधिक लाभ कमाने के चक्कर में 15 से 18 बच्चों को बैठा कर फर्राटे से कट मारते हुए स्कूल ले जाते हैं।
* किसकी गलती कहें*
वाहन चालक की जो ज्यादा कमाई के चक्कर में नियम तोड़ रहे हैं ।या उन अधिकारियों की जो स्टाफ की कमी से जूझते हुए कभी यात्री वाहन, स्कूल बस एवं दुर्घटना से बचने के लिए ट्रैक्टर-ट्रालियों के पीछे रेडियम लगा रहे हैं। यातायात विभाग आवारा पशुओं को पकड़ पकड़ कर सींग में रेडियम एवं वृक्षों पर रेडियम लगा रहे हैं ।
*ना जाने क्यों ऐसा लगता है कि इन सब में हम भी कहीं ना कहीं जिम्मेदार हैं। माता-पिता अपने बच्चों की परवरिश के लिए क्या नहीं करते हैं। बच्चों को जरा सी चोट आ जाए तो मारकाट पर उतारू हो जाते हैं ।किंतु जब अपने बच्चों को ऐसे स्कूल ऑटो में बैठाते हैं। जिनमें पहले से ही 15 बच्चे बैठे होते हैं। उस वक्त क्यों हम विरोध नहीं करते। यह जानते हुए भी कि ऑटो में पहले से ही अत्यधिक बच्चे बैठे हुए हैं।
* सही बात तो यह है कि हम चाह कर भी विरोध नहीं कर पाते हैं बस मारुति वैन ऑटो जब दुर्घटनाग्रस्त होता है तो हम बिरोध में सड़क पर उतर आते हैं। उससे आखिर क्या होगा । मुआवजा मिलेगा, प्रशासन तत्काल कार्रवाई के आदेश देगा और बात खत्म।
* आखिर में नुकसान माता-पिता बच्चे का ही होगा भगवान ना करे कभी ऐसी नौबत आये। बच्चे अपने हैं विरोध भी हमें करना है । मैंने सिर्फ अपने विचार व्यक्त किए जरूरी नहीं कि मैं सही हूं।
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