निजी विद्यालय के संचालकों ने शिक्षा को बनाया व्यापार। निर्देशों को ठेंगा दिखा कर स्कूलों का कर रहे संचालन। जिगर के टुकड़े की जान से खिलवाड़ अभिभावक खामोश क्यों। भाजपा के कार्यकर्ता जीवन गोल्या ने सोशल मीडिया पर उठाया ज्वंलत मुद्दा।

मुकेश दुबे 9826036011
हरदा।जिले में निजी शालाओं के संचालकों ने शिक्षा को व्यापार बना लिया है। व्यापार में बच्चों के हक हित ,जान, शासन के कायदे-कानूनों की कोई परवाह नहीं होती। उनका एक मात्र लक्ष्य अधिकाधिक मुनाफा कमाना होता है। इसके लिए किस हद तक गिर सकते हैं इसका अनुमान लगाना कठिन है। इसके लिए काफी हद तक अधिकारी के साथ-साथ अभिभावक भी जिम्मेदार हैं। ऐसा करने वालों का अभिभावक संगठित होकर बहिष्कार कर दे तो स्वयमेव वे लाइन पर आ जाएंगे किंतु संगठन के अभाव का लाभ लेकर मालामाल हो रहे।
*कुकुरमुत्ते की तरह निजी विद्यालयों को दी मान्यता * गाइडलाइन का तनिक भी ख्याल नहीं रखा जा रहा। निर्धारित मापदंडों का अभाव होने पर भी सख्त कार्यवाही करते हुए उनकी मान्यता खत्म करने की कार्यवाही नहीं की जा रही। बुनियादी सुविधाओं भी उपलब्ध नहीं रहती। जिसे निरीक्षण के दौरान लालच व दबाव में आकर उसे नजरअंदाज कर देते हैं।कुछेक स्कूल तो किराए के भवनों में संचालित हो रहे हैं। स्वच्छ पेयजल, प्रसाधन की समुचित व्यवस्था नहीं, सुरक्षा के लिए बाउंड्री वाल, चौकीदार CCTV कैमरा आदि नहीं लगाया है। शारीरिक एवं मानसिक विकास के लिए खेल अनिवार्य तो कर दिया गया।किंतु गिने-चुने स्कूलों में ही खेल मैदान की सुविधा है। ऐसे में मान्यता कैसे मिल गई भगवान ही मालिक है।
*B.Ed b.ed प्रशिक्षित शिक्षकों से अध्यापन कराना अनिवार्य है। फिर भी इसका पालन नहीं किया जा रहा। दिव्यांगों के लिए रैंप और टॉयलेट की सुविधा नहीं है। सुरक्षा के लिए अग्निशामक यंत्र भी नहीं है। निर्धारित दुकान से ही पाठ्य सामग्री व गणवेश आदि खरीदने के लिए दबाव बनाया जाता है। फीस में मनमानी अनुपात में वृद्धि की जाती है। जिला प्रशासन द्वारा बनाई गई कमेटी धृतराष्ट्र की भूमिका निभा रही है सब कुछ देखने सुनने के बाद भी अनजान बनी है।
* नौनिहालों की जान से खिलवाड़ का जिम्मेदार कौन* निजी शालाओं में परिवहन सुविधा देने के नाम पर नौनिहालों की जान से खुलेआम खिलवाड़ किया जा रहा है। इसके लिए जिम्मेदार कौन है। यह अहम सवाल खड़ा हो रहा है। अभिभावक, जिला प्रशासन, स्कूल शिक्षा विभाग, परिवहन विभाग, पुलिस विभाग, निजी स्कूल के संचालक ऑटो चालक इसमें से जिम्मेदार कौन है। यह तय नहीं हो पा रहा। हादसे के बाद सभी हरकत में आ जाते हैं। किंतु हादसे के पहले विचार मंथन कर उसे रोकने की दिशा में प्रभावी कदम उठाने की दिशा में मुकम्मल पहल करने के लिए किसी के नाम पर खानापूर्ति की जाती है। इसी तरह प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा कार्रवाई की रूपरेखा तैयार कर उसे ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता। शक्ति से अमल नहीं किया जाता।
* अभिभावक अपने जिगर के टुकड़े की जान से हो रहे खिलवाड़ के प्रति ना जाने क्यों खामोश है। संगठित होकर ऐसा कोई कदम नहीं उठा रहे जिससे मनमानी कमीशनखोरी थम सके। बच्चों बसों में खिड़कियों से झांकते और हाथ फैलाते रहते हैं। उन्हें कोई रोकने टोकने वाला नहीं। जबकि प्रत्येक स्कूल वाहनों में स्कूल का एक कर्मचारी अनिरुद्ध अनिवार्य रूप से मौजूद होना चाहिए घरेलू गैस से मारुति वैन फर्राटे से दौड़ लाइए 3- 4 राउंड लगाने के चक्कर में बेलगाम गति वाहन बच्चों को बैठाकर चलाते हैं। ऑटो में 8 से 10 बच्चे की बजाय 15 से 18 बच्चों को बैठाकर फर्राटे से कट मरते हुए जाते हैं। यह देखते हुए भी अभिभावक उसी ऑटो में बच्चों को बैठाते हैं। वाहन चालक ज्यादा फायदे के चक्कर में नियमों एवं बच्चों की जान की तनिक भी परवाह नहीं करते हैं। स्टाफ की कमी से जूझ रहे यातायात विभाग द्वारा दुर्घटनाओं को रोकने के लिए रेडियम लगाने की कार्यवाही तत्परता से की जा रही है। किंतु न जाने क्यों इस तरफ ध्यान नहीं दिया जाता। जब कोई हादसा होगा तब जांच के आदेश होंगे पीड़ित को मुआवजा दे दिया जाएगा समय बीत जाने के बाद घटना को भुला दिया जाता है दुर्घटनाओं के आशंका को जड़ से नष्ट करने की दिशा में प्रभावी कदम उठाने की तरफ ध्यान नहीं दिया जाता है ।
* यही वजह है कि बरसों से विद्यमान समस्या अब नासूर बन गया है। इसका समाधान कब होगा कौन करेगा। इस बारे में कुछ भी कहा कहना और कायस लगाना मुश्किल है।

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